Thursday, January 10, 2019

33 # बंध दराज़ ...

एक आध दशक बीत चुकी
उस दराज़ को देखे, खोले, याद किये
आज न जाने क्यों बहुत याद आ रही थी -
सुबह से शाम हो गई
कई बार सामने से गुजर चुके थे
पर एक बार भी हिम्मत ने साथ न दिया -
दिमाग को समझाया
दिल को मनाया
एक झटके में दराज़ खोल डाला -
मासूम से कुछ ख़त बिखरे पड़े थे
कुछ देर उनको यूही निहारा
फिर प्रेम से सबको समेटा -
बस अब हम, ख़त और रात है
यारो के बीच की बात है
आँखों में कुछ नमी सी है
मिट रही बरसो की कुछ कमी सी है ...

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