मुर्दो की बस्ती में भी
मिल जाते है इंशान कभी कभी
भर जाते है जख़्म मगर
रह जाते है निशान कभी कभी
सबका पेठ भरकर खुद भूखा
सो जाता है किसान कभी कभी
जो पाऊ लड़खड़ाते है जमी पर
छू लेते है वो आसमान कभी कभी
ज़माने की जुबान बोलने से बेहतर
है रहना बेजुबान कभी कभी
उजड़ जाते है घर और रह जाते है
पिछे सिर्फ मकान कभी कभी
जो खुद पर हो गुरुर बहुत
तो देके देख इम्तिहान कभी-कभी... #mg
Main aur Mere Tanhai ...
Saturday, October 18, 2025
160. कभी कभी...
159. हालात ए जिंदगी...
नापने को जमीन कम पड़ रही
और उड़ाने को आसमान
इश्क के लिए वक्त कम पढ़ रहा
और सुकून के लिए जहान
बस इक दूरियाँ कम नहीं हो रही
दो दिलों के दरमियान
नफरते कम नहीं हो रही, और
घर बनते जा रहे है मकान
लफ़्ज़ों को तमीज चाहिए
देना होगा किरदार पर थोड़ा ध्यान
इंसानियत कटघरे में है, और
इंसान बदलते जा रहा है अपना बयान
कीमत बढ़ती जा रही है दुनियादारी की
सस्ते होते जा रहे है इंसानी जान
कल तक जो जीने का फलसफा था
अब बनते जा रहे हैं दास्तान
पत्थरों की बस्ती में ना ढूंढ 'तन्हा'
तू इश्क के निशान
रेतीले शेहरा में हो रहा है तूझे
पानी का गुमान
Thursday, March 13, 2025
158. होली
अबके होली जो आना
संग प्रीत गुलाबी लेते आना
सोला सावन बीत गए है
तुम रंग सतरंगी लेते आना
रंग पिला हल्दी सा गालो पर मलना
मांग में मेरी रंग लाल सिंदूरी भरना
शरारतों में डूबा रंग नारंगी लाना
हरने मन मेरा संग रंग हारी भी लाना
एक अबीर सिर्फ मेरे नाम का रखना
जब पिचकारी भिगोए मुझे
तुम कुछ मर्यादा भी रखना
रंगों में भरके चमचमाती चंदा की चाँदनी
किरणे सूरज की सुनहरी लेते आना
अबकी फागुन जो आना
खास मेरे लिए होली लेते आना... #mg
Sunday, February 26, 2023
157 # बचपना
मां कसम भगवान कसम
जब सर्वोपरी था
वो दौर पुराना चाहती हूं
ठोकर पर गिरु भी
तो उठ कर
बेबाग मुस्कुराना चाहती हूं
फिर एक टॉफी में
सारे मामले
रफा दफा हो चाहती हूं
कट्टी बट्टी में ही
हर प्रॉब्लम का
फिर सलूशन चाहती हूं
मेरी बैटिंग पहली हो
वरना बैट लेकर घर जाने की
वो आज़ादी फिर चाहती हूं
मैं बचपन में नहीं
आपने बचपने में
लौट जाना चाहती हूं... 💞
Saturday, December 10, 2022
156 # मेरी मात हुई
अनोखी एक वारदात हुई
बरसों बाद उनसे बात हुई
पुरानी चाय की टपरी पर
मेहरबा आज काएनात हुई
उनसे फिर पहली बार सी
इत्तफाकन मुलाकात हुई
आंखों आंखों हुई कई बातें
लबसे ना ज़िक्रे हालात हुई
चाह कर भी ना पुछ सका
दुरी क्यों अपने दरमेयात हुई
चाह थी चंद उजालों की
जाने क्यों राह में रात हुई
लगाई थी बाजी दिल पर
शायद तभी मेरी मात हुई...
Tuesday, November 8, 2022
154# माँ...
मेरी बात आज फिर तुम रखोगी ना माँ
अपनी छाँव में सदा मुझे रखोगी ना माँ
कल उंगलियाँ थाम चलना सिखाया था
आज सर पे हाथ रख राह दिखाओगी ना माँ
ओझल आंखों से हो, जिंदगी से ना होना
इतनी सी बात तो मेरी मानोगी ना माँ
इस पार मैं जैसे तेरी यादों को जी रही हूं
उस पार तुम भी मुझे याद रखती हो ना मां
मेरे दिल की हर अनकही समझ जाती हो
तुम बिन कितनी 'तन्हा' हू जानती हो ना माँ
जानती हूं तुम्हें रोकना अब मेरे बस में नहीं
पर जब भी याद करें पास आओगी ना माँ ... 💞
Sunday, November 6, 2022
153# वो ज़माने याद आए... (poem )
आज उनसे हुई जो मुलाकात
जाने कितने फसाने याद आए
वो यू मुस्कुरा कर मिले
जीने के सारे बहाने याद आए
बजी साईकिल की घंटियां
जवानी के सारे इशारे याद आए
कॉफी के सिप पर
कितने किस्से पुराने याद आए
देहलीज़ से लौट गई जो
वो मौसम बहारे याद आए
शर्मा के पलके झुकाई तो
बदलते सारे जमाने याद आए
दिल का शैलाब आंखों तक आकर माना
जो सारे घाव पुरानी याद आए
बस इतनी सी ही तो कभी चाहत थी
हम भी उन्हें किसी बहाने याद आए
तन्हा आज तन्हा ही खुश है
जो बेहाल जहाँ के सारे दीवाने याद आए
मुस्कुरा कर लौटे उनके कूचे से आज
जो टूटे दिलों के जमाने याद आए ....
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