मुर्दो की बस्ती में भी
मिल जाते है इंशान कभी कभी
भर जाते है जख़्म मगर
रह जाते है निशान कभी कभी
सबका पेठ भरकर खुद भूखा
सो जाता है किसान कभी कभी
जो पाऊ लड़खड़ाते है जमी पर
छू लेते है वो आसमान कभी कभी
ज़माने की जुबान बोलने से बेहतर
है रहना बेजुबान कभी कभी
उजड़ जाते है घर और रह जाते है
पिछे सिर्फ मकान कभी कभी
जो खुद पर हो गुरुर बहुत
तो देके देख इम्तिहान कभी-कभी... #mg
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