मुर्दो की बस्ती में भी
मिल जाते है इंशान कभी कभी
भर जाते है जख़्म मगर
रह जाते है निशान कभी कभी
सबका पेठ भरकर खुद भूखा
सो जाता है किसान कभी कभी
जो पाऊ लड़खड़ाते है जमी पर
छू लेते है वो आसमान कभी कभी
ज़माने की जुबान बोलने से बेहतर
है रहना बेजुबान कभी कभी
उजड़ जाते है घर और रह जाते है
पिछे सिर्फ मकान कभी कभी
जो खुद पर हो गुरुर बहुत
तो देके देख इम्तिहान कभी-कभी... #mg
Saturday, October 18, 2025
160. कभी कभी...
159. हालात ए जिंदगी...
नापने को जमीन कम पड़ रही
और उड़ाने को आसमान
इश्क के लिए वक्त कम पढ़ रहा
और सुकून के लिए जहान
बस इक दूरियाँ कम नहीं हो रही
दो दिलों के दरमियान
नफरते कम नहीं हो रही, और
घर बनते जा रहे है मकान
लफ़्ज़ों को तमीज चाहिए
देना होगा किरदार पर थोड़ा ध्यान
इंसानियत कटघरे में है, और
इंसान बदलते जा रहा है अपना बयान
कीमत बढ़ती जा रही है दुनियादारी की
सस्ते होते जा रहे है इंसानी जान
कल तक जो जीने का फलसफा था
अब बनते जा रहे हैं दास्तान
पत्थरों की बस्ती में ना ढूंढ 'तन्हा'
तू इश्क के निशान
रेतीले शेहरा में हो रहा है तूझे
पानी का गुमान
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